जानिए, कैसे दहेज और रखरखाव का मासिक एवं एकमुश्त गुजारा भत्ता, महिलाओं को गरिमा के साथ जीने की अनुमति नहीं देता

जानिए, कैसे दहेज और रखरखाव का मासिक एवं  एकमुश्त गुजारा भत्ता, महिलाओं को गरिमा के साथ जीने की अनुमति नहीं देता

 

दहेज, एक बुराई

आप किसी से भी एक प्रश्न पूछें कि, दहेज क्या है? ज्यादातर का कहना होगा कि, यह वह कीमत है जिसका भुगतान एक महिला या उसके परिवार द्वारा, उसे शादी के लिए स्वीकार करने के लिए, संभावित पति को किया जाता है। इस साधारण से स्पष्टीकरण में, प्रथमदृष्टिया कई सवाल भी छिपे हुए हैं।

अगर दहेज एक जाना-माना अपराध है और हर किसी को इसके बारे में जानकारी है, तो दहेज की मांग होने का दावा करने वाली किसी भी महिला को, या उसके परिवार वालों को, दहेज के आदान-प्रदान से दूर रहने से किसीने रोका है क्या? यह बात, इस बात को ध्यान में रखते हुए भी है कि, अक्सर यह पीड़ा व्यक्त की जाती है कि, भारत में लड़कियोँ की तुलना में लड़कों की संख्या अधिक है। इसका मतलब यह हुआ कि महिलाओं के पास विकल्प अधिक हैं, लिहाजा वो दहेज चाहने वालों को अस्वीकार कर सकतीं हैं। जैसा कि दावा किया जाता है, भारतीय पुरुष महिलाओं को ‘वस्तु’ के रूप में देखते हैं, यह बात इस बात की सूचक है कि भारत में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की मांग अधिक है। इस स्थिति में तो यह ही तर्कसंगत है कि, पुरुष ही महिलाओं को दहेज दें, क्योंकि महिलाओं के पास विकल्प भी अधिक हैं और मोलभाव के अवसर भी।

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यह तथ्य भारत में हर माता-पिता को बताना चाहिए कि परिवार में वयस्क बेटियों को बेकार फर्नीचर की भांति या खुद कमाने में अक्षम मवेशियों की भांति नहीं देखा जाना चाहिए। दहेज एक ऐसी मानसिकता का लक्षण है, जहां लोग वयस्क बेटी को एक ऐसे बोझ के रूप में देखते हैं जिसे कपड़े और भोजन के रूप में नियमित रूप से रखरखाव की आवश्यकता होती है।

दहेज एक ऐसी रिश्वत है जो किसी पुरुष को एक ऐसे महिला की जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए दी जाती है, जो खुद को गरिमामय जीवन यापन करने में अक्षम घोषित कर चुकी हो। इसलिए दहेज कई मायनों में अपराध है और जिसको बढ़ावा, वास्तव में दहेज देनेवाले ही देते हैं।

यह कांच की एक ऐसा वस्तु है जिसे समाज ने लंबे समय से नजरअंदाज किया हुआ है। सम्भवतः या तो कांच इतना पारदर्शी था कि वह अदृश्य था, या फिर इतना अपारदर्शी था कि प्रकाश की किरण टकरा कर लौट गई। यह भी संभव है कि लोग छत देखने में इतने व्यस्त थे, कि वे उनके सामने क्या है, देख ही नहीं पाए।

 

पिंजरा कांच का

महिलाओं ने खुद को उत्पीड़न का मानसिक कैदी बना रखा है। इस तथ्य को कैसे समझाया जा सकता है कि व्यावसायिक योग्यता के साथ उच्च शिक्षित, हर प्रकार से सक्षम महिला भी खुद को दहेज उत्पीड़न की शिकार बताती है। यहाँ जिम्मेदार कौन है? महिला खुद, या उसके माता-पिता। ये वही माता-पिता हैं जिन्होंने अपनी बेटी की पड़ाई-लिखाई में, अपना बमशक्क्त अर्जित धन लगाया था। दुनिया के कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को इस सोच के साथ शिक्षित नहीं करते, कि बड़े होने पर वह उन्हीं के उपर आर्थिक रूप से निर्भर हो जएगा। इसके अलावा, दुनिया में कोई भी ऐसा शैक्षिक पाठ्यक्रम नहीं है जो महिलाओं को अपनी आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर होने की जरूरत बताता हो।

अगर माता-पिता द्वारा तय किए विवाह के संदर्भ में बात करें, तो कोई भी भारतीय माता-पिता अपनी बेटियों से छुटकारा पाने के लिए दूल्हे पर दहेज बरिश करने को उतावले नहीं होने चाहिए, लेकिन ऐसा है। उन्हें लगता है कि उनकी बेटीयाँ खुद कमाने और जीवन यापन करने में अक्षम हैं, या फिर वे कुछ मानसिक, भावनात्मक या शारीरिक अक्षमताओं को छुपाने के लिए अपनी बेटी को दहेज से लपेटते हैं?

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कारण जो भी हो, उत्पीड़न पीड़िता होना, चाहे माता-पिता द्वारा मजबूर किए जाने से, या खुद की ख़ुशी से, कांच के एक ऐसे पिंजरे में होने जैसा है, जिसे कई महिलाओं ने सावधानी से पाला है, मज़े लिए हैं और किसी भी सूरत में नष्ट नहीं होने दिया है। लेकिन उन्हें यह समझ नहीं है कि इससे, उनके स्वयं के भविष्य के लिए और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए गंभीर परिणाम होंगे।

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चाहे खुद या उसके माता पिता द्वारा या फिर सरकार द्वारा प्रायोजित किसी कार्यक्रम के माध्यम से, एक बार भी अगर महिला के अंदर, उत्पीड़न पीड़िता होने का विचार दृढ़ता से स्थापित हो जाता है, तो महिला तर्कसंगत विचार छोड़कर, जो भी उसकी राय में उसके रखरखाव के लिए जिम्मेदार है, उसके पीछे पड़ने के लिए खुद को निरंतर प्रोत्साहित करने लगती है। वह यह भूल जाती है कि परिपक्व आयु का हर व्यक्ति खुद के रखरखाव के लिए, स्वं ही जिम्मेदार होता है। कई महिलाएं, जो किसी भी तार्कि के साथ वकील के पास या अदालतों में पहुंच जाती हैं, वो स्वं ही अपनी आजीविका अर्जित करने और सम्मानजनक जीवन यापन करने के अपने मार्ग बंद कर लेती हैं। आज समानता के इस युग में, कोई भी महिला, जो खर्चा करना जानती है, उसे यह भी जानना चाहिए कि वह अपने पिता या पति पर निर्भर होने कि बजाय, खुद भी कमा सकती है। चाहे वह अकेली हो, शादीशुदा हो, पति से अलग हो या तलाकशुदा हो।

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यदि हम कॉलेज में पढने वाली किसी भी छात्रा से पूछें कि वो उच्च शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहती है, तो वह काम करने के लिए अपनी आकांक्षाओं, आजीविका, महत्वाकांक्षा और समाज की सेवा के विषय में बताएगी। तो फिर क्यों महिलाएं शादी के बाद मासिक गुजारा-भत्ता मांगती हैं और क्यों शादी तोड़ने समय वो एकमुश्त गुजारा-भत्ता मांगती हैं? क्या यह उन महिलाओँ का अपमान नहीं है जिन्होंने दुनिया में सबकुछ अपने बल पर प्राप्त किया है? यह उन लड़कियों के लिए निराशाजनक और अपमानजनक नहीं होना चाहिए, जो बड़ी ही इस सोच के साथ हुई हैं कि उन्हें अपने जीवन निर्वाह के लिए, अंततः भाग्यानुसार किसी ना किसी पुरुष पर निर्भर होना ही पड़ेगा? यह एक विडंबना ही है कि जिन महिला कार्यकर्ताओं ने माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एक आदेश में ‘keep’ (रखैल) शब्द के प्रयोग पर घोर आपत्ति की थी, वही महिला कार्यकर्ता, मासिक व एकमुश्त गुजारे-भत्ते के, महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध, कानूनी प्रावधानों पर अजीबोगरीब चुप्पी बनाए हुए हैं।

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गुजारा-भत्ता, ज्यादा से ज्यादा केवल उस विकलांग जीवन साथी को, एक निशचित समयावधि के लिए उचित ठहराया जा सकता है, जो कि शादी कि निरंतरता के दौरान विकलांगता को प्राप्त हुआ हो।

संपत्ति का बंटवारा, ज्यादा से ज्यादा शादी के पालन के दौरान, पति-पत्नि के संयुक्त बचत में हिस्सेदारी के रूप में जायज हो सकता है। परन्तु यह सेवानिवृत्ति लाभ या पेंशन योजना नहीं है और न यह तलाक के लिए दी गई प्रोत्साहन राशी है।

अगर दहेज एवं गुजारे-भत्ते की अवधारणाओं को उखाड़ा न गया, या अतीत के दस्तावेज़ों में दफनाया न गया, तो भविष्य की पीढ़ियों में महिलाओं के सामने, सही मायने के महिला सशक्तिकरण और गरिमामय जीवन के एहसास से भी वंचित रह जाने का खतरा, हमेशा बरकरार रहेगा।

मैं तो चुपचाप खड़े रहकर, अपनी किशोर बेटी को बड़े हो कर, किसी भी पुरुष पर एक परजीवी की भांति निर्भर होते, या जैसा कि ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान’ कि परिकल्पना है, जीवित रहने, जीवन यापन करने या आकांक्षाओं को मारने की अनुमति नहीं दे सकता।

और आप?

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Originally blogged in English here by Parthasarathy TR

 

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